aansu (hindi refined)

"आँसू" - सी. आचार्य

​महल, ताज का मैंने हे बनवाया,
फ़हरिस्त, शिंडलर की भी मैंने ही बनवाई।
​मैंने ही भेजा उसको, रोते देवदास की ओर,
जो मर रहा था, करके अपनी पारो की खोज।

​मंदिर, कोणार्क की चोटी पे मैंने ही पहुँचाया,
और वो छलांग, जीवन बचाने वाला।
​नाव, बाजी राउत की मैंने ही ठहराई,
और गोली, छाती की, वीरत्व जगाने वाली।

​मैं ही बनाता हूँ कवि, जो लिखे मेरी कविता बरसने वाली।
नम हों अगर आँखें, और बह रहे हों आँसू,
​नदियाँ बन के फूल खिले,
बस बहने दो ये आँसू।

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