shanti ki khoj (revised final time)
कुछ लोग ज़मीन से नफ़रत करते हैं, कुछ पानी से,
तो शायद मैं शांति पाऊँ समुद्र तटों पे।
कुछ चाँद से घृणा करते हैं, कुछ सूरज की धूप से,
मैं शायद शांति पाऊँ उनके ग्रहण से।
कुछ को जीना ही गवारा नहीं, कुछ मरने से डरते हैं,
तो क्या शांति मिले पक्षाघात में?
कुछ भूमध्य रेखा से घृणा करते हैं, कुछ ध्रुवों से नफ़रत करते हैं,
मैं शायद शांति पाऊँ मकर और उसके जुड़वाँ में।
और कुछ हैं जिन्हें शोर और गोबर से नफ़रत है,
तो शायद मैं शांति पाऊँ उपनगरों में।
कुछ को ऊँचाई डराती है, कुछ को ज़मीन नीचे की,
तो क्या मैं शांति पाऊँ उनके बीच में?
और तुम, मेरे प्यारे,
मैं जानता हूँ तुम बेवजह खुद से नफ़रत करते हो,
और मैं भी वैसा ही हूँ,
तो हम शांति पाऐं एक दूसरे के साथ में।